पद्मावती समय का सारांश/काव्य सौंदर्य
पृथ्वीराज रासो चंद्रवरदाई द्वारा रचित आदिकाल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद महाकाव्य है। इसकी आकारगत अलग-अलग चार प्रतियां उपलब्ध हैं। इसको प्रामाणिक और अप्रामाणिक मानने संबंधी तीन अलग-अलग मत हैं। इस ग्रंथ को लेकर विद्वानों में बहुत अधिक मतभिन्नता रही है। हिंदी साहित्य के इतिहास में इस ग्रंथ का इसीलिए बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है।
पद्मावती समय पृथ्वीराज रासो का बीसवां सर्ग है। इसकी नायिका पद्मावती है। पद्मावती राजा विजयपाल की पुत्री है,जो समुद्र शिखर नामक द्वीप के मालिक हैं। इस महाकाव्य के नायक ज़ाहिर है कि पृथ्वीराज चौहान हैं। इस महाकाव्य के रचनाकार चंद्रवरदाई पृथ्वीराज के अभिन्न मित्र हैं। बीसवें सर्ग का नाम पद्मावती समय है। ग़ौरतलब है कि पृथ्वीराज रासो में सर्ग को समय के नाम से इंगित किया गया है।
चंद्रवरदाई को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी का प्रथम महाकवि माना है। आलोचक इनका जन्म 1168 ई. में लाहौर में मानते हैं। चंद्रवरदाई दिल्ली के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समकालीन और सामंत थे। इन्हें पृथ्वीराज के दरबार में उच्च स्थान हासिल था और राज कवि के रूप में भी यह प्रतिष्ठित थे। पृथ्वीराज के साथ चंद्रवरदाई की अभिन्न मित्रता भी साहित्यिक कृतियों में बराबर बताई जाती रही है।
इस बीसवें सर्ग में जिसका नाम पद्मावती समय है, का कथा सार इस प्रकार है-
राजा विजय पाल और रानी पद्मसेन के यहां एक पुत्री का जन्म हुआ है,जिसका नाम उन्होंने पद्मावती रखा है। प्रारंभ के पदों में पद्मावती के अलौकिक बाल रूप का चित्रण है। पद्मावती के सौंदर्य का चित्रण कवि ने अतिशयोक्तिपूर्ण शैली में किया है।
किशोर उम्र की पद्मावती को तोते के द्वारा दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान के युद्ध कौशल और अद्वितीय व्यक्तित्व का गुणगान सुन कर उनके प्रति अनुराग उत्पन्न हो जाता है। रूप गुण वर्णन सुनकर प्रेम हो जाना आदिकाल के काव्य की कथानक रूढ़ियों में रही है। वह पृथ्वीराज चौहान के साथ मानसिक रूप से अनन्य होती जा रही है।
उधर परंपरा के अनुसार पिता किशोरी पुत्री के विवाह हेतु योग्य वर ढूंढ रहे हैं। इसके लिए वे अपने पुरोहित को वर रोकने की सामग्री लेकर विधिवत विदा करते हैं। पुरोहित कुमोदमणि नामक राजा के साथ कन्या पद्मावती की सगाई कर आते हैं। प्रजा के उत्साह का ठिकाना नहीं। हर युग में प्रजा ऐसी ही रही है। राजा के सुख में सुखी, दुख में दुखी।
उधर पद्मावती का पृथ्वीराज के प्रति अनुराग बढ़ता जाता है। पद्मावती समय में पृथ्वीराज के शौर्य एवं वीरता का बखान भी अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से किया गया है, जो कि आदिकाल के काव्य की विशेषताओं में गिनी जाती है।
इस काव्य में पृथ्वीराज चौहान को वीरता के उच्चतम गुणों से युक्त राष्ट्रीय नायक के तौर पर चित्रित किया गया है। प्रस्तुत काव्यांश में पृथ्वीराज रासो के पद्मावती समय का जो अंश है वह एक तरफ जहां पद्मावती के अद्वितीय सौंदर्य का चित्रण करता है तो वहीं दूसरी तरफ तोते के द्वारा पृथ्वीराज के अतुलनीय गुणों का वर्णन सुनकर पद्मावती के मन में पृथ्वीराज के प्रति प्रेम अंकुरित होने को दर्शाया गया है।
सगाई के बाद तोते के द्वारा पद्मावती पृथ्वीराज चौहान को पत्र भिजवाती है और उनसे यह आग्रह करती है कि वह आए और उसे ले जाए। यह ले जाना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि पृथ्वीराज के प्रति अनुरक्ति महसूस करने के पूर्व ही अपने पिता द्वारा पुरोहित को भेज कर कुमोदमणि के साथ हो चुकी उसकी सगाई दोनों के बीच बाधा बन चुकी है।
पद्मावती पृथ्वीराज से निवेदन करती है कि अगर उसे पद्मावती के उच्च कुलोत्पन्न और शीलवती होने का विश्वास है तो कुमोदमणि के साथ उसके पाणिग्रहण के पहले वह उसे उसी प्रकार ले जाए, जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने रुक्मणी हरण करके उनके साथ परिणय किया था। इसके बाद पृथ्वीराज चौहान का वीरोचित वेशभूषा पहनकर पद्मावती को लाने के लिए निकलने के समय का बिंबात्मक रूप चंद्रवरदाई ने प्रस्तुत किया है। वह अपने शूर- सामंतो और वीर योद्धाओं के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान करता है। बीच में शहाबुद्दीन गौरी के साथ उनकी घमासान लड़ाई का चित्रण किया गया है।
समुद्र शिखर में कुमोदमणि बारात लेकर पहुंच चुका है। झरोखे से दिल्ली की ओर से आने वाली उदास पद्मावती का भावुक चित्रण कवि ने किया है। बारात के आगमन पर घरातियों की भागमभाग दिखाने से भी कवि चूके नहीं हैं। सारे पक्षों का एक जगह एकत्रित होना, शहाबुद्दीन और पृथ्वीराज की सेना का आमना-सामना कवि ने बहुत स्वाभाविक रूप में दिखाया है। कवि ने शत्रु सेना के पराक्रम और सैनिकों की प्रशंसा भी खुले मन से की है,जो कि आमतौर पर कम दिखाई देती है। कवि ने युद्ध का जीवंत चित्रण किया है। वीभत्स रस का निर्वह और,बिम्ब विधान बहुत ही स्वाभाविक बन पड़े हैं।
कुल मिलाकर पृथ्वीराज रासो के पद्मावती समय में पद्मावती के रूप – लावण्य और पृथ्वीराज चौहान की वीरता का सुंदर चित्रण करने के साथ साथ युद्ध कौशल का सजीव चित्रण किया गया है। इसके साथ ही पारिवारिक जीवन, शादी- ब्याह, नेग-शगुन इत्यादि का भी स्वाभाविक वर्णन हुआ है। शृंगार, वीर और वीभत्स रस का आकर्षक प्रयोग हुआ है।
© डॉ. संजू सदानीरा



