रामधारी सिंह दिनकर कृत कृष्ण चेतावनी की मूल संवेदना/भावार्थ
हिंदी के प्रसिद्ध कवियों में से एक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक स्थान पर हुआ। उनकी मृत्यु 1974 में चेन्नई में हुई।
इन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी सम्मानित किया गया ।ये 1952 से 1964 तक राज्य सभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। उनकी पुस्तक संस्कृत के चार अध्याय के लिए उन्हें साहित्य अकादमी तथा उर्वशी के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया।
कृष्ण चेतावनी दिनकर द्वारा रचित कोई पृथक रचना न होकर उनके सुप्रसिद्ध खंडकाव्य रश्मिरथी के तृतीय सर्ग का एक महत्वपूर्ण अंश है। इस अंश के अंतर्गत उस प्रसंग को प्रस्तुत किया गया है जिसमे पांडव अपना वनवास समाप्त करके लौटे हैं। उन्होंने वनवास के कठिन समय के दौरान स्वयं को तपा कर वह स्वाभिमान और शक्ति प्राप्त की है कि उनका आत्मविश्वास आसमान पर है।वे अब हस्तिनापुर राज्य में अपने हिस्से की मांग करते हैं। दूसरी और दुर्योधन अब भी उनके वनवास को अधूरा मानता है और अहंकारवश उनको नष्ट करने के लिए युद्ध की भावना से परिपूर्ण है।
इस सब के बीच रचनाकार रामधारी सिंह दिनकर ने कृष्ण की शांति दूत की भूमिका पर प्रकाश डाला है। कृष्ण शांति चाहते हैं और शांति के आधार पर धर्म की स्थापना करना ही उनका उद्देश्य है। अतः शांति दूत बनकर वे हस्तिनापुर जाते हैं। वहां जाकर कौरवों की सभा में वे यह प्रस्ताव रखते हैं कि पांडवों को हिसाब से तो उनके हिस्से का आधा राज्य दिया जाना चाहिए लेकिन इतना भी नहीं कर पा रहे तो उन्हें मात्र पांच गांव दे दिये जायें। वे उसी में गुजारा कर लेंगे परंतु परिजनों पर तलवार नहीं उठाएंगे।
कृष्ण कहते हैं कि पांडवों की मांग मान लेनी चाहिए जिससे युद्ध को टाला जा सके। युद्ध करने का कोई लाभ नहीं है। भाई-भाई से युद्ध करें या उचित नहीं है। वे दोनों पक्षों के बीच शांति समझौते की भावना से हस्तिनापुर की राज्यसभा में पधारे हैं। एक प्रकार से वे पांडवों के दूत बनकर आए हैं।
इस बात को स्वीकार करने से दुर्योधन मना कर देता है। वह युद्ध के लिए अडिग रहता है। दुर्योधन का कहना है कि वह पांडवों को सुई की नोक के बराबर भूमि भी देने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं वह अहंकारवश कृष्ण को बंदी बनाने का प्रयत्न भी करता है। उसके इस प्रयत्न और दुस्साहस के फलस्वरुप कृष्ण अपना विकराल रूप दिखाकर यह घोषणा करते हैं कि दुर्योधन मूर्खता कर रहा है।
वह उन्हें क्या ही बांध पाएगा! कृष्ण क्रुद्ध होकर दुर्योधन से कहते हैं कि क्या उसके पास उन्हें बांधने के लिए ऐसी कोई श्रृंखला (सांकल ) है जो उनके उस विशाल रूप को बांध सके ? कृष्ण स्वयं को वह शक्ति बताते हैं जिसने सारा संसार विद्यमान है।वे अपने विराट रूप को दिखा कर बताते हैं कि पृथ्वी, आकाश,पाताल,सागर, पर्वत अर्थात सृष्टि की प्रत्येक वस्तु उन्हीं से उत्पन्न और उन्हीं में समाहित होती है।
कृष्ण के विराट रूप को देखकर सभी बेहोश हो जाते हैं। केवल महात्मा विदुर और धृतराष्ट्र ही कृष्ण के इस विराट रूप के दर्शन कर पाते हैं। दोनों श्रीकृष्ण के समक्ष हाथ जोड़े उनकी जय जय कर रहे हैं। खंडकाव्यकार यहां उनके सृष्टि कर्ता रूप का चित्रण कर रहे हैं।
कृष्ण चेतावनी नामक रश्मिरथी के इस अंश में कृष्ण दुर्योधन के अहंकार को चूर-चूर करने का प्रयास तो करते ही है साथ ही उसे अपने व्यापक और विराट रूप से भी अवगत करा देते हैं। कृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में दुर्योधन को उनकी बात न मानने का परिणाम भुगतने की चेतावनी दी।
श्रीकृष्ण कुपित होकर बोलते हैं कि पांडवों के साथ समझौता न करके उसने उस भीषण रक्तपात को आमंत्रित किया है, जिसे आने वाला समय महाभारत के रूप में याद रखेगा। कृष्ण भयंकर शब्दों में भावी युद्ध की वीभत्स तस्वीर दिखाकर दुर्योधन को इस आगामी समस्त नरसंहार के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं। “ जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है” जैसी प्रसिद्ध पंक्तियां यहीं से उद्धृत की जाती हैं।
वह इस अंश में न सिर्फ अपने सृष्टिकर्ता अथवा आदि रूप को प्रकट करते हैं बल्कि महाभारत की लड़ाई में होने वाले सभी दृश्यों का पूर्वाभास करवा देते हैं। रश्मिरथी के कृष्ण चेतावनी अंश में ओज गुण, गौड़ी रीति और वीभत्स रस का सुंदर संयोग एवं उदाहरण देखे जा सकता हैं।
दुर्योधन को प्रताड़ना और उसकी मूर्खता के परिणामस्वरूप होने वाले युद्ध के लिए उसे चेताने के कारण इस अंश का नाम कृष्ण चेतावनी रखा गया है। रश्मिरथी खंडकाव्य से इस अंश को कई विश्वविद्यालयों में पृथक पाठ के रूप में पढ़ाया जाता है। बता दें कि रश्मिरथी के नायक महाभारत के सुप्रसिद्ध पात्र कर्ण हैं। कर्ण का अन्य नाम रश्मिरथी है। कर्ण के जीवन की विडम्बना, उसके संघर्ष, दुर्योधन के साथ उसकी मित्रता और छल से उसकी हत्या तक के वृत्तांत को रश्मिरथी में विषय बनाया गया है।
पारिवारिक सुविधाओं से सफलता का सुनिश्चय, वर्ण व्यवस्था में नीचे पायदान के नुकसान, गुरु के क्रोध का परिणाम और मित्रता की पराकाष्ठा जैसे बहुत सारे प्रश्न रश्मिरथी खंडकाव्य में रचनाकार ने उठाये हैं। दिनकर जी द्वारा ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य में रचित प्रबंध काव्यों में इसका बहुत महत्त्व है। आस्थावान पाठकों, कृष्ण भक्तों, कर्ण के चरित्र के प्रशंसकों और वीर काव्य के बीच कुरुक्षेत्र बहुत लोकप्रिय है।
© डॉ संजू सदानीरा
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