इसका रोना कविता का भावार्थ/मूल संवेदना
इसका रोना कविता
तुम कहते हो – मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है।
मैं कहती हूँ – इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है॥
सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे।
बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे॥1॥
ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो।
यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो॥
कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है।
छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है॥2॥
हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है।
पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है॥
जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है।
छूटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है॥3॥
मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है।
जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है॥
मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में।
जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में॥4॥
मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ।
वह मेरी प्यारी बिटिया है, मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ॥
तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान।
जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान॥5॥
-(सुभद्रा कुमारी चौहान)
इसका रोना कविता का भावार्थ
इसका रोना कविता हिंदी की प्रख्यात कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान के द्वारा रचित है। सुभद्रा जी द्विवेदी युग की एक ऐसी साहित्यकार हैं, जिन्होंने महिला साहित्यकारों का साहित्य लेखन के क्षेत्र में नामोल्लेख मात्र नहीं करवाया वरन झांसी की रानी जैसी कालजयी कविता लिखकर हिंदी साहित्य के इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करवाया। उस युग में ही नहीं इस समय भी महिलाओं की सारी प्रतिभा रसोईघर और गृहस्थी संभालने में खर्च हो रही है। ऐसे में सुभद्रा कुमारी का लेखन के क्षेत्र में नाम दर्ज़ करवाना और अपनी पहचान बनाना अत्यंत उल्लेखनीय है।
बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे सादे चित्र उनके महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं। देश के प्रति, वीरों का कैसा हो बसंत, सभा का खेल, बोल उठी बिटिया मेरी, जलियांवाला बाग और झांसी की रानी उनकी प्रसिद्ध कविताएं हैं।
इसका रोना वत्सल रस से भरी एक प्यारी, नरम छुअन-सी सुखद कविता है। संभवत एक बच्ची का रोना परिवार में अन्य लोगों विशेष कर बच्ची के पिता को अप्रीतिकर लग रहा होगा। ऐसे में बच्ची के रोने के माध्यम से सुभद्रा कुमारी जी ने अपने मनोभावों अथवा एक मां के मन के उद्गारों को व्यक्त किया है।
कवयित्री बालिका के पिता या अन्य संबंधी को संबोधित कर कहती है कि उन्हें बच्ची का रोना उन्हें नहीं सुहाता है जबकि वे (कवयित्री) कहती हैं कि बालिका के रुदन से अनुपम सुख उस घर में छा जाता है। यहां उनका आशय कदाचित इस बात से है कि कैसे बच्चों की किलकारियां घर का माहौल खुशनुमा बना देती है, अन्यथा बिना बच्चों वाले घरों में चुप्पी की एक छाया हर तरफ दिखाई देती है।
कवयित्री कहती हैं कि एक बार उस रोने वाले की छवि को प्यार से अगर निहारा जाए तो उन आंखों से निकलने वाली आंसू की बड़ी बड़ी बूंदों पर वे लोग मोतियों की माला निछावर कर देंगे। आगे, रोती हुई बच्ची का मानो चित्र खींचते हुए लेखिका कहती हैं कि बच्ची के छोटे-छोटे होंठ और लंबी-सी सिसकी को देखा जाए, उसके छोटे से गले और बड़ी-सी हिचकी को देखा जाए। बच्ची की दृष्टि कितनी करुणा से भरी हुई है,देख कर मन उमड़ पड रहा,मानो बालिका अपने निर्दोष रुदन से उनके मन के सात्विक और आत्मीय भावों को ही उभार रही हो!
कवयित्री हंसी और रुदन का फर्क बताते हुए कहती हैं कि किसी की हंसी अधिकतर बाहरी चहल-पहल को दिखाती है, लेकिन वहीं, रोना मन की भीतरी तहों तक एक हलचल मचा देता है। उस रुदन को देखकर सहृदय की आत्मा जगती है, मन बेचैन होता है और ऐसा लगता है मानो रोता बच्चा अपने किसी साथी को पास बुला रहा हो!
अब लेखिका अपनी बात करते हुए कहती हैं कि विशेषकर वे जब उस रुदन को सुनती हैं तो उन्हें लगता है कि जैसे उनका अनन्य उन्हें ही बुला रहा है! उन्हें ऐसा लगता है जैसे रोते बच्चे की करुणापूर्ण पुकार से सिर्फ़ मां का ही नाता होता है। शिशु अभी हर तरह से मां पर ही निर्भर है।खाने,पीने और सोने हर तरह की गतिविधि के लिए मां पर उसकी निर्भरता मां और उसके बीच में एक प्रगाढ़ संबंध की रचना करती है। वह हंसने रोने और जीवन की प्रत्येक क्रिया में मां के सहयोग की अपेक्षा के कारण मां से अधिक जुड़ा है। (परिवार के शेष लोगों का असहयोग भी इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है।)
कवयित्री मातृत्व की भावना से आपूरित होकर भावुक मन से कहती है कि वे उसकी जन्म प्रदाता हैं और वह बिटिया उनकी अन्यतम कृति है। कवयित्री अपनी बच्ची के रोने से चढ़ने वालों को साफ-साफ कहती हैं कि उन लोगों को बच्ची के रोने से चिढ़ आती है और इन्हें उस पर गर्व होता है और उसकी तुलना वे भक्तों की पुकार सुनकर गर्वित होने वाले भगवान से करती हैं।
कविता में एक तरफ तो एक भावुक मना मां के मन के भावों को प्रकट किया गया है तो वहीं दूसरी तरफ बालिका के रुदन से व्यवधान महसूस करने वाले लोगों को जवाब दिया गया है।
अगर कविता की पड़ताल की जाए तो कुछ ख़ूबियों के साथ इसके शिल्प में एक त्रुटि भी दिखाई देती है। कुछ पंक्तियों में बच्ची के लिए पुल्लिंग क्रिया का प्रयोग हुआ है तो वहीं अंतिम पद्यांश में उसे स्त्रीलिंग रूप में (बिटिया) दर्शाया गया है। यहां एकरूपता होनी चाहिए थी। शेष तो यह कवयित्री के मन की भावना को व्यक्त करने वाली सरल शब्दों में लिखी अर्थात अभिधा प्रधान प्रसाद गुण से युक्त वत्सल रस की कविता है।
© डॉ. संजू सदानीरा
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