लोकोक्तियाँ : अर्थ, उदाहरण, वाक्य प्रयोग

‌‌लोकोक्तियाँ : अर्थ, उदाहरण, वाक्य प्रयोग और परीक्षोपयोगी अभ्यास प्रश्न

 

साहित्यिक भाषा में कहावतों को ‘लोकोक्तियाँ’ कहते हैं। वस्तुतः कहावत लोक (जनता) + उक्तियाँ (कथन) = लोक की उक्ति/ बात। अर्थात लोकोक्तियां जनमानस से निकले हुए सच्चे अनुभवों का संकलन हैं। जनजीवन में सैकडों वर्षों के अनुभव से जो बात प्रचलित हो जाती है, वही कहावत अथवा लोकोक्ति का रूप धारण कर लेती है। समय पाकर वही लोकोक्ति किसी विशिष्ट अभिप्राय को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होने लग जाती है। लोकोक्तियों से हमारे दैनिक जीवन-व्यवहारों का परिचय मिलता है।

मानवीय जीवन की सरसता और रोचकता से प्रभावित लोकोक्तियों के प्रयोग से भाषा भी सरस, रोचक और प्रभावोत्पादक बन जाती है। इनमें मानवीय ज्ञान के सूत्र गुँथे हुए हैं तथा बुद्धि और अनुभव का सुन्दर सम्मिश्रण है। ख़ास बात यह है कि ये एक छोटी सी कहानी या अभिप्राय अपने अंदर निहित रखती हैं।

अलंकृत भाषा कृत्रिम और आडम्बर पूर्ण हो सकती है, पर लोकोक्तियों की भाषा स्वाभाविक और प्रभावोत्पादक ही होती है, क्योंकि किसी भी भाषा की लोकोक्तियाँ उस देश की सामाजिक और ऐतिहासिक अनुभूतियों का संक्षिप्त रूप होती हैं। जिस प्रकार भोजन को सरस, स्वादिष्ट और सलोना बनाने के लिए नमक की आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार भाषा को सरस, सजीव और सलोनी बनाने के लिए लोकोक्तियों की आवश्यकता होती है। वास्तव में एक अरबी कहावतानुसार,

‘भाषा में लोकोक्ति का वही स्थान है, जो भोजन में नमक का होता है।’

साहित्य में जो महत्त्व लोकगीत और लोक कथाओं का है, भाषा में वही महत्त्व लोकोक्तियों का है। जनता जनार्दन के कथन का संग्रह अरस्तू जैसे महान विद्वानों ने भी किया था, रूसी उपन्यासकार गोर्की ने इन्हें श्रमिक जनता की अनुपम थाती के रूप में माना है। डा० वासुदेवशरण अग्रवाल के मतानुसार लोकोक्तियाँ ज्ञान के चोखे और चुभते हुए सूत्र तथा घनीभूत रत्न हैं।

लोकोक्तियों के द्वारा हम अपने विचारों का भली प्रकार से प्रतिपादन कर सकते हैं तथा अपने भावों को अधिक स्पष्ट एवं सुबोध बना सकते हैं। अतः विद्यार्थियों को भी आरम्भ से ही इनका ज्ञान परमावश्यक है।

लोकोक्ति और मुहावरे का अन्तर

लोकोक्तियाँ अपने आप में पूर्ण एवं स्वतन्त्र होती हैं, जबकि मुहावरे अपने आप में पूर्ण और स्वतन्त्र नहीं होते। लोकोक्तियों को किसी वाक्य का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं, पर मुहावरों को वाक्य का सहारा लेना आवश्यक होता है। लोकोक्ति का प्रयोग ज्यों का त्यों किया जाता है, पर मुहावरे का स्वरूप लिंग, वचन और क्रिया के प्रयोगानुसार बदल जाता है। लोकोक्ति में सत्य अथवा विचार की उस समय के हिसाब से पूर्ण अभिव्यक्ति होती है।

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नीचे कुछ लोकोक्तियों का अर्थ एवं प्रयोग उदाहरणस्वरूप दिया जा रहा है–

1. अब पछताये होत का जब चिड़ियाँ चुग गई खेत= काम बिगड़ जाने पर पछताना व्यर्थ है।

नवल ने पहले तो पढ़ाई नहीं की, अब असफल होने पर पर रो रहा है। पर अब पछताये होत का जब चिड़ियाँ चुग गई खेत ।

 

2. अन्धों में काना राजा-मूर्खों में थोड़े गुणों वाला भी सम्मान पाता है।

भारतीय ग्राम अब भी अशिक्षा के केन्द्र हैं। वहाँ के साक्षर पण्डे-पुजारी अन्धों में काने राजा बने हुए हैं।

 

3. अधजल गगरी छलकत जाय-ओछा व्यक्ति इतराता अधिक है।

अजय को राजस्थान लॉटरी में दो हजार का इनाम मिलने से वह अब धरती पर पैर नहीं रखता। सच है-अधजल गगरी छलकत जाय ।

 

4. अपनी करनी पार उतरनी= कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।

विजय सदा नशेड़ियों के साथ रहता था। अतः एक भी अक्षर उसने नहीं पढ़ा। परीक्षाफल जब निकला तो उसका नाम ही नहीं था। उसके दोस्त ने उसे रोता हुआ देखकर कहा कि अपनी करनी पार उतरनी ।

 

5. आधा तीतर आधा बटेर= अनमेल वस्तुओं का संयोग।

मदन ने धोती के ऊपर बुशर्ट पहन रखी थी और पैरों में जुराब और जूते उसको इस प्रकार देखकर उसके मित्र प्रदीप ने कहा कि आज तुम ख़ूब आधा तीतर आधा बटेर बने हुए हो।

 

6. आम के आम गुठली के दाम= दूना लाभ होना।

शरद ने जयपुर में पढ़ाई के साथ साथ नौकरी भी कर ली। अतः शिक्षा के साथ-साथ वह धन भी पाने लगा। इस प्रकार उसने यह कहावत चरितार्थ की कि आम के आम गुठली के दाम ।

 

7. आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास= किसी बड़े काम के लिए जाकर छोटा काम करना।

बसन्त दिल्ली सी. ए. की कोचिंग लेने के लिए गया था। वहाँ जाकर क्लर्क बन गया तो उसके मित्रों ने कहा भाई वाह। आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास ।

 

8. आँख के अन्धे नाम नयनसुख= गुण के विरुद्ध नाम।

हजारीलाल ने अपने पुत्र का नाम तो रख दिया करोड़ीमल, पर नौकरी उसे चपरासी की भी नहीं मिली। गरीबी में ही बाप-बेटों के दिन बीतने लगे तो एक मित्र ने कहा, ये हैं आँख के अन्धे नाम नयनसुख ।

 

9. दुविधा में दोऊ गये माया मिली न राम= अस्थिर चित्त से किये गये काम सर्वथा असफल होते हैं।

हेमन्त ने कालेज में तो नाम लिखा ही लिया था, वह नौकरी की भी तलाश में था। पूरा वर्ष बीत गया, न पढ़ाई की, न नौकरी ही मिली। फलतः परीक्षा में भी सफलता नहीं मिली। सच ही है दुविधा में दोऊ गये माया मिली न राम ।

 

10. कंगाली में आटा गीला= आपत्ति पर आपत्ति आना।

दिनेश के घर में पिछले सप्ताह चोरी हुई थी और इस सप्ताह उसका बटुआ खो गया। बेचारे के साथ यही कहावत चरितार्थ हुई कि कंगाली में आटा गीला।

 

11. नाच न जाने आँगन टेढ़ा= स्वयं से कुछ आता नहीं, साधनों को दोष देना।

रमेश अपने आप को वालीबॉल का अच्छा खिलाड़ी बताया करता था। एक बार मैच में उसे खिलाया तो उसने इतनी बॉल बिगाड़ी कि उसका दल हार गया। खेल समाप्त होने पर उसने कहा कि आज बॉल में हवा कम थी और नेट कुछ ऊँचा था तो उसके साथियों ने कहा कि अरे भाई रहने भी दो, तुम तो यही बात सिद्ध कर रहे हो कि नाच न जाने आँगन टेढ़ा।

 

12. खोदा पहाड़ निकली चुहिया =अत्यधिक परिश्रम करने पर भी फल कुछ नहीं।

संजू को जब दस किलोमीटर के पर्वतारोहण के बाद कुछ खास मनोरम दृश्य नहीं दिखा तो उसके मुंह से निकला खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

 

13. काला अक्षर भैंस बराबर= बिल्कुल अनपढ़ होना।

भारत को स्वतन्त्र हुए इतने वर्ष हो गये पर अब भी गाँवों में ऐसे-ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है।

 

14. ऊँट के मुँह में जीरा= अधिक खाने वाले को थोड़ा सा देना।

एक दिन मथुरा में चौबेजी घर पर भोजन करने आये। उनकी थाली में थोड़ी सी पूरी और मिठाई रखकर उनसे कहा कि महाराज श्रीगणेश कीजिए। उन्होंने कहा कि भाई इतना सा भोजन तो मेरे लिए ऊँट के मुँह में जीरे के समान है।

 

15. ऊँची दुकान फीके पकवान= आडम्बर मात्र ।

सुरेश अपने लिए कोट का कपड़ा लेने शहर की एक दुकान में गया तो उसे उसकी पसन्द का एक भी कपड़ा नहीं मिला तो उसने कहा कि शहर में भी ऊँची दुकान फीके पकवान वाली कहावत चरितार्थ हुई ।

 

16. अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता= एक आदमी कुछ नहीं कर सकता।

दीपक जब भ्रष्टाचार का विरोष करने लगा तो उसके मित्र ने कहा कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। आज तो सर्वत्र भ्रष्टाचार है।

 

नीचे कुछ लोकोक्तियों के केवल अर्थ दिये जा रहे हैं। उनका प्रयोग विद्यार्थी स्वयं करेंगे। प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना है कि मूल लोकोक्ति का ही प्रयोग करें, अर्थ का प्रयोग न किया जाय ।

 

1. उलटे बाँस बरेली को =उलटा काम करना।

 

2. ऊधो का लेना न माधो का देना= हर प्रकार के लफड़े से दूर रहना।

 

3. काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती= घोखा एक ही बार दिया जा सकता है।

 

4. का वर्षा जब कृषि सुखाने= समय बीतने पर सहायता करने से क्या लाभ ?

 

5. कोयले की दलाली में हाथ काले =कुसंग में रहने से कलंक लगता ही है।

 

6. घर का भेदी लंका ढाये= आपसी फूट से अपना ही बुरा होगा।

 

7. चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय= अत्यधिक कंजूस ।

 

8. चुपड़ी और दो दो= दोनों ओर से लाभ।

 

9. जिसकी लाठी उसकी भैंस= बल ही प्रधान है।

 

10. तबेले की बला बन्दर के सिर= अपराध किसी का दण्ड किसी को।

 

11. धोबी का कुत्ता घर का न घाट का= कहीं भी मान-सम्मान न होना।

 

12. न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी= झगड़े की जड़ ही नष्ट कर देना।

 

13. नौ नकद न तेरह उधार =अधिक उधार से नकद कम भी अच्छा ।

 

14. नौ दिन चले अढ़ाई कोस = अत्यधिक सुस्त ।

 

15. मुँह में राम बगल में छुरी = मित्रता का दिखावा ।

 

16. बावन तोले पाव रत्ती = बिल्कुल ठीक ।

 

17. भई गति साँप छछूदर की = द्विविधा में पड़ जाना।

 

18. भैंस के आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराय= मूर्ख के सामने उपदेश की बात करना व्यर्थ है।

 

19. मान न मान मैं तेरा मेहमान= जबर्दस्ती गले पड़ना।

 

20. समरथ को नहीं दोष गुसाईं = बड़े आदमी के सब दोष माफ होते हैं।

 

21. सांप मरे न लाठी टूटे = काम भी हो जाय हानि भी न हो।

 

22. सावन सूखे न भादो हरे = सदा एक-सी दशा में रहना ।

 

23. सीधी उँगली घी नहीं निकलता= सीधेपन से काम नहीं चलता।

 

24. हथेली पर सरसों नहीं जमती= कहने के साथ काम पूरा नहीं। (बड़ी सफलता के लिए परिश्रम और प्रतीक्षा करनी पड़ती है।)

 

25. हाथ कंगन को आरसी क्या = प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं।

 

26. हाथ सुमरनी बगल कतरनी = मन में कुछ और सामने कुछ।

 

27. हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और = कथनी और करनी में अन्तर होना।

 

28. होनहार बिरवान के होत चीकने पात = महान व्यक्ति होने के लक्षण बचपन में दिखाई देगे लग जाते हैं।

 

29. आगे नाथ ने पीछे पगहा= स्वतंत्र होना।

 

30. आधी छोड़ सारी को धावै, आधी मिले न सारी पावै = लालच का फल बुरा होता है।

 

31. अन्धा पीसे कुत्ता खाये= परिश्रम कोई करे, आनन्द कोई उड़ाये ।

 

32. नौ कनौजिए तेरह चूल्हे = फूट होना।

 

33. एक ही थैली के चट्टे-बट्टे = सब एक जैसे होना।

 

34. उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे = अपना दोष स्वीकार न करके दूसरे को ही दोषी बताना।

 

35. उतर गई लोई, क्या करेगा कोई= प्रतिष्ठा नष्ट होने पर किसी का डर नहीं होना।(बेशर्म हो जाना)।

 

36. एक पन्थ दो काज= एक प्रयास से दो काम पूरे होना।

 

37. गागर में सागर भरना = थोडे़ में बहुत कह देना।

 

38. गाँव का जोगी जोगना आन गांव का सिद्ध = अपने स्थान पर किसी के गुणों को न पहचानना।

 

39. चोर की दाढ़ी में तिनका = अपराधी का छोटी-सी बात पर भी घबरा जाना।

 

40. जल में रहे मगर से बैर = अपने आश्रयदाताओं से शत्रुता रखना ।

 

41. जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ= परिश्रम का फल अवश्य मिलता है। (सफलता के लिए बहुत ज्यादा परिश्रम करना पड़ता है।)

 

42. जगन्नाथ का भात जगत पसारे हाथ= मुफ़्त की वस्तु सब चाहते हैं।

 

43. तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर= आय से अधिक व्यय नहीं करना चाहिए।

 

44. डूबते को तिनके का सहारा= आपत्ति में थोड़ी सहायता भी बहुत होती है।

 

45. तिरिया तेल हमीर हठ चढ़े न दूजी बार= दृढप्रतिज्ञ सदा अटल रहता है।

 

46. तुरन्त दान महा कल्याण = जो काम करना है, उसे शीघ्र करना चाहिए।

 

47. थोथा चना बाजे घना= तथ्य कम आडम्बर अधिक।

 

48. दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है = एक बार धोखा खाने पर सावधानी से काम करने लग जाना।

 

49. दूध का दूध पानी का पानी = सच्चा न्याय करना।

 

50. दिया तले अँधेरा= अपनी खोज खबर न रखना।

 

51. रस्सी जल गई पर बल नहीं गया = बुरी दशा होने पर भी घमंड दूर नहीं होना।

 

52. बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद = मूर्ख व्यक्ति गुण की परख नहीं कर सकता।

 

53. ओछे की प्रीत बालू की भीत= छोटे आदमी(घाघ आदमी) की मित्रता अस्थायी होती है।

 

54. करमहीन खेती करें, बैल मरे या सूखा परे = भाग्यहीन व्यक्ति को कभी सफलता नहीं मिलती। (अकर्मण्य व्यक्ति अनिपुण तरीके से काम करता है इसलिए उसे असफलता मिलती है।)

 

55. कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली= अत्यधिक अन्तर होना। (असमानता को बढ़ावा देने वाली लोकोक्ति)।

 

56. चोरी और सीना जोरी= अपराध करने पर भी अकड़ना।

 

57. तन पर नहीं लत्ता पान खाय अलबत्ता = व्यर्थ की शेखी मारना।

 

58. सिर मुंडाते ही ओले पड़ना= कार्य प्रारंभ करते ही विघ्न आ जाना।

 

59.अपना हाथ जगन्नाथ = अपना काम अपने हाथों से ही अच्छी तरह से होता है।

 

60. ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती= आवश्यकता से बहुत कम मिलने से तृप्ति नहीं होती।

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अभ्यास प्रश्नोत्तरी

 

1. ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’ और ‘निन्यानवे के फेर में पड़ना’ में से लोकोक्ति कौन-सी है ? लोकोक्ति का अर्थ भी लिखिए।

उत्तर- इन दोनों में ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’ लोकोक्ति है।

अर्थ- स्वयं की भूल छिपाने के लिए साधनों पर दोषारोपण करना ।

 

2. ‘आटे दाल का भाव मालूम होना’ और ‘ऊँची दुकान फ़ीका पकवान’ में लोकोक्ति कौन-सी है? लोकोक्ति का अर्थ भी लिखिए।

उत्तर- उक्त दोनों में ‘ऊँची दुकान फीका पकवान’ लोकोक्ति है।

अर्थ-केवल शोशेबाजी होना,असल में कमतर।

 

3. निम्नांकित कहावतों का अर्थ लिखिए-

1. कंगाली में आटा गीला,

2. खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

उत्तर- 1. आपत्ति पर आपत्ति आना।

2. अत्यधिक परिश्रम करने पर भी फल कुछ नहीं मिलना।

 

4. ‘न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी’ और ‘चैन की बंशी बजाना’ में लोकोक्ति कौन-सी है ? लोकोक्ति का अर्थ भी लिखिए।

उत्तर- उक्त दोनों में लोकोक्ति ‘न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी’ है।

अर्थ-समूल नष्ट कर देना।

 

5. ‘घर सिर पर उठाना’ और ‘घर का भेदी लंका ढावे’ में लोकोक्ति कौन सी है ? लोकोक्ति का अर्थ भी लिखिए ।

उत्तर-उक्त दोनों में लोकोक्ति है-घर का भेदी लंका ढावे ।

अर्थ-आपस की फूट से घर का सर्वनाश हो जाता है।

 

6. निम्नलिखित कहावतों का क्या अर्थ होता है ?

1. बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय,

2. साँप मरे न लाठी टूटे।

उत्तर- 1. बुरे काम का बुरा फल होता है।

2. बिना हानि के काम पूरा होना।

 

7. ‘सहज पके सो मीठा होय’ और ‘सब्ज बाग दिखाना’ में लोकोक्ति कौन-सी है? लोकोक्ति का अर्थ भी लिखिए।

उत्तर-दोनों में से लोकोक्ति ‘सहज पके सो मीठा होय’ है।

अर्थ-धैर्यपूर्वक कार्य करना फलदायक होता है।

 

8. ‘एक पन्थ दो काज’ लोकोक्ति का अर्थ बताइए और उसका वाक्य में प्रयोग कीजिए।

उत्तर-अर्थ- एक उपाय से दो काम पूरे होना।

प्रयोग- प्रीति दीपावली पर अपने घर गई थी। वहाँ उसकी मुलाक़ात पक्की सहेली ममता से भी हो गई। इस प्रकार एक पन्थ दो काज वाली कहावत चरितार्थ हो गई।

 

9. नीचे लिखी लोकोक्ति का सार्थक प्रयोग अपने वाक्य में कीजिए-

‘गागर में सागर’

उत्तर-बिहारी सतसई में बिहारी ने शृंगार, भक्ति और नीति के ऐसे पद लिखे हैं मानो उसमें उन्होंने गागर में सागर भर दी।

 

10. निम्नलिखित कहावतों का क्या अर्थ होता है?

1. दूध का जला छाछ को फूंक फूंक कर पीता है।

2. न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी

उत्तर 1.एक बार किसी काम में हानी हो जाने पर अन्य कामों को भी डरते-डरते करना, चाहे उनमें हानी की संभावना ही न हो।

2.ऐसी शर्त पर काम स्वीकार करना जो कभी पूरी ही नहीं हो सके अर्थात काम से इनकार कर देने का सटीक बहाना करना।

 

© डॉ. संजू सदानीरा

 

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Dr. Sanju Sadaneera

डॉ. संजू सदानीरा प्रतिष्ठित मोहता पीजी कॉलेज में प्रोफेसर और हिंदी साहित्य विभाग की प्रमुख हैं। इन्हें अकादमिक क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का समर्पित कार्यानुभव है। हिन्दी, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान विषयों में परास्नातक डॉ. संजू सदानीरा ने हिंदी साहित्य में नेट, जेआरएफ सहित अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर शोध कार्य किया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के स्नातक के पाठ्यक्रम के लिए इनकी किताबें विशेष उपयोगी हैं। ये "Dr. Sanju Sadaneera" यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी शिक्षा के प्रसार एवं सकारात्मक सामाजिक बदलाव हेतु सक्रिय हैं।

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