करहा देश सुहामणउ …… करीरां झाड़ि पद की व्याख्या
प्रसंग
प्रस्तुत पद कवि कल्लोल द्वारा रचित राजस्थान के प्रसिद्ध प्रेम काव्य ढोला मारू रा दूहा से लिया गया है।
करहा देश सुहामणउ, जे मूँ सासरवाड़ि।
आँब सरीखउ आक गिणि, जाळि करीराँ झाड़ि ॥
संदर्भ
इसके पूरे पद में ऊंट ढोला से राजस्थानी धरती के प्रति अपनी अरुचि जताता है। इस पद में ढोला उसके जवाब में जो कुछ भी कह रहा है, उसी का चित्रण किया गया है।
व्याख्या
ढोला ऊंट से कहता है कि यह (राजस्थान) भूमि अत्यंत सुंदर है। यह उसकी ससुराल है, इसकी निंदा नहीं की जानी चाहिए। ढोला ऊंट को सलाह देता है कि रास्ते में मिलने वाले आक के पौधों को आम के पेड़ समझना है और करील की कंटीली झाड़ियों को कदम्ब के वृक्ष समझना है।
विशेष
1.ढोला का अपनी ससुराल की भूमि के लिए अपनत्व दिखाई देता है। आम तौर पर पुरूषों को अपनी ससुराल की भूमि से इतना लगाव नहीं होता है।
2.आक के पौधों को आम के पेड़ समझना और करील की कंटीली झाड़ियां को कदम्ब के वृक्ष समझने के माध्यम से वस्तुओं को सकारात्मक रूप से देखने का संदेश देने की कोशिश की गई है।
3. राजस्थानी भाषा का सौंदर्य दर्शनीय है।
4. वार्तालाप शैली का रोचक प्रयोग हुआ है।
© डॉ. संजू सदानीरा




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