कुछ न पूछ मैंने क्या गाया कविता का मूल भाव

”कुछ न पूछ मैंने क्या गाया” कविता का मूल भाव 


मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी के बहुपठित साहित्यकारों में से एक हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी जिले की चिरगांव तहसील में 1886 ईस्वी में और निधन 1964 ईस्वी में हुआ था।भारत भारती, जयद्रथ वथ,पंचवटी, यशोधरा, द्वापर, साकेत, जय भारत, विष्णुप्रिया इत्यादि इनकी प्रमुख पद्य रचनाएँ हैं। तिलोत्तमा, चंद्रमास और एवं अनघ इनके द्वारा रचित नाटकों के नाम हैं। गुप्त जी द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। गुप्त जी की कविताओं में भाषा सौंदर्य और लाक्षणिकता बाद की कविताओं में अधिक प्रशंसनीय बन पड़ा है। उनकी कुछ कविताओं में छायावाद के प्रारंभिक लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। समीक्ष्य कविता में कवि अपने जीवन के व्यक्तिगत उतार-चढ़ाव के बारे में सोच विचार कर रहे हैं। कवि अपने जीवन से वार्तालाप करते हुए मन ही मन कह रहे हैं कि उनसे यह सवाल न किया जाए कि उन्होंने क्या गाया और क्या गंवाया। कवि अपने मन से मुखातिब होते हुए बताते हैं कि जो उनके मन ने निर्देश दिए उन्हें उन्होंने सर झुकाकर पूरा किया। कब उनके मन ने क्या कहा इन सब का मतलब कवि स्वयं भी समझ नहीं पाए। लेकिन फिर भी वह इतना कह सकते हैं कि उन्होंने वह किया जो उनके मन में आया। बांसुरी से वैसा ही स्वर निकलता है, फूंक के रूप में जैसी वायु उसके छिद्रों में प्रविष्ट करती है। कवि का कहना है कि जीवन की लहरों ने जैसा धक्का दिया उतनी ही उठापटक जीवन में बनी रही। जब तक जीवन में धन संपदा का बीमार मोह बना रहा तब तक सुखमय हो नहीं पाया। यह शरीर कठपुतली की तरह विषय वासनाओं के न जाने कितने नाच नाचता रहा। फिर अनगिनत तरीकों से इधर-उधर हाथ-पांव मारने पर भी न तो जीवन का सच्चा अर्थ प्राप्त हुआ और न ही तृष्णा मिटी। धीरे-धीरे कवि को जीवन के वास्तविक अर्थों का भान हुआ और उन्होंने बाह्याकार के बजाय मूल पर ध्यान लगाने का प्रयास किया। जैसे-जैसे दिखावे की व्यवस्था का पता लगना शुरू हुआ,वैसे-वैसे कवि ने झूठे दिखावे के किले नष्ट करना शुरू किया। जब अंतर का तार मिला तो वास्तविक स्वर प्राप्त हुए और तब कवि को महसूस हुआ कि अब यह उन्होंने गाया।


इस प्रकार कवि कहना चाहते हैं कि झूठ और दिखावे के जीवन के बजाय सच्चे और यथार्थ जीवन का आनंद उठाना मानव जीवन के लिए श्रेयस्कर है।वो यह भी संकेत कर रहे हैं कि मनुष्य सबसे झूठ बोल सकता है परन्तु अपने हृदय के समक्ष अपनी पूरी सच्चाई के साथ प्रस्तुत होने के लिए बाध्य है। वहाँ अगर फरेब करना नहीं आता, खुद को झुठलाना नहीं आता तो फिर अन्तर की आवाज को सुनने से आत्म परिष्कार के मार्ग पर अग्रसर होता है और आडंबरों की व्यर्थता का बोध समझ कर उससे दूर हो जाता है। 

© डॉ. संजू सदानीरा


कुछ न पूछ, मैंने क्या गाया


कुछ न पूछ, मैंने क्या गाया,


बतला कि क्या गंवाया?


जो तेरा अनुशासन पाया


मैंने शीश नवाया।


क्या क्या कहा, स्वयं भी उसका


आशय समझ न पाया,


मैं इतना ही कह सकता हूँ-


जो कुछ जी में आया।


जैसा वायु बहा वैसा ही 


वेणु-रन्ध्र-रव छाया;


जैसा धक्का लगा, लहर ने 


वैसा ही बल खाया।


जब तक रही अर्थ की मन में 


मोहकारिणी माया,


तब तक कोई भाव भुवन का


भूल न मुझको भाया।


नाची कितने नाच न जानें,


कठपुतली-सी काया,


मिटी न तृष्णा, मिला न जीवन,


बहुतेरे मुँह बाया।


अर्थ भूलकर इसीलिए अब,


ध्वनि के पीछे धाया,


दूर किये सब बाजे गाजे,


दूह ढोंग का ढाया।


हृदतन्त्री का तार मिले तो


स्वर हो सरस सवाया,


और समझ जाऊँ फिर मैं भी


यह मैंने है गाया ॥


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