उदयशंकर भट्ट लिखित पर्दे के पीछे एकांकी की मूल संवेदना
उदयशंकर भट्ट एक ऐसे सामाजिक नाटककार हैं जिनकी दृष्टि समाज की सड़ी गली रूढ़ियों एवं भ्रष्ट मानसिकता पर बराबर पड़ती रही है। उन्होंने समाज की प्रत्येक विसंगति पर करारा व्यंग्य किया है।चाहे वह परिवार में स्त्री के सम्मान को लेकर हो, समाज के व्यक्तियों का अमानवीय-असामाजिक व्यवहार हो, भट्ट जी की नजर से कोई भी सामाजिक बुराई बच नहीं पाई है। परदे के पीछे भी उनका एक सोद्देश्य एकांकी है। इस एकांकी के मध्यम से उन्होंने बड़े-बड़े व्यापरियों के छोटे-छोटे कुकृत्यों का पर्दाफाश किया है।
एकांकी का मुख्य पात्र सेठ छीतरमल एक ऐसे व्यापारी का प्रतिनिधित्व करता है जो कालाबाजारी, टैक्स चोरी, गरीबों का शोषण जैसी सारी शोषणकारी प्रवृत्तियों में लिप्त होने के बाद ब्राह्मणों को दान देकर और राम-राम का जाप करके अपने कुकृत्यों को छुपाता है या अपने काले कारनामों पर धर्म का पर्दा डालने का काम करता है।
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सेठ छीतरमल और उसके चाचा चांदीराम इसी समाज के जीवंत किरदार है। नौकरों का शोषण करना, किरायेदरों को परेशान करना, अपने कर्मचारियों की मामूली तनख्वाह को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना, स्वयं की लाखों की कमाई को खून पसीने वाली साबित करना, रिश्वत से सरकारी अफसरों को खरीदना, मौका पड़ने पर गधे को भी बाप समझने की प्रवृत्ति न सिर्फ इस एकांकी में सेठ छीतरमल की विशेषता है बल्की आज के समाज की अथवा धन पशुओं की कठोर सच्चाई है।
भट्ट जी ने स्वयं कहा है कि उनके एकांकियों के पात्र काल्पनिक नहीं वरन् यथार्थ जगत से उठाये हुए हैं। इसलिए इस एकांकी के भी प्रत्येक पात्र में एक गहरी वास्तविकता दिखाई देती है। वैसे आज समाज का असली चेहरा देखना नामुमकिन-सा हो गया है। राम नाम की चादर के नीचे काले कारनामों से भरा दिल छुपा होता है। मीठी बातों के पीछे तीखे स्वार्थ छुपे होते हैं।
एकांकी में उदयशंकर भट्ट जी ने दिखाया है कि सरकारी मुलाज़िम थोड़ी-सी कीमत पर अपना ज़मीर बेचते फिरते हैं। राजनीतिक दल देश को गिरवी रखने से भी परहेज़ नहीं करते। जिन्होंने देश को आजाद कराने में अपनी जान दी, वे खामोशी से विदा हो गए, जो शेष रह गए, उन्होंने सत्ता की मलाई इस निर्लज्जता से चाटी कि आम आदमी के हिस्से सिर्फ अभाव और अशांति ही आई। सेठों ने अपनी अमीरी का कारण अपनी सांठगांठ और धूर्तता को न मान कर अपने परिश्रम को माना।
गरीबों में अभाव का कारण अपनी स्वार्थपरता, जमाखोरी और शोषक प्रवृत्ति को न मान कर उनके भाग्य को माना। हर प्रकार से लोगों का खून चूसने वाला सेठ छीतरमल पशुओं का अस्पताल खोले कर खुद को महात्मा दिखाता है,ये और बात है कि डॉक्टर की तनख्वाह बढ़ाने के नाम पर उसे ख़ून के आंसू रुला देता है। हम आज भी समाज में अमीरों की इस कूटनीति और राजनीति को क़दम क़दम पर देख सकते हैं।
एकांकी का एक पात्र जो “ व्यक्ति” के नाम से चित्रित है, अफसर का रिश्तेदार निकलते ही “रामचंद्र जी”(उसका असली नाम) बन जाता है। नौकरी चली जाने के कारण उस पर सेठ का किराया बाकी था, जिसके लिए उसे रोज़ रोज़ अपमानित किया जा रहा था। दरोगा के हाथों कहां तो उसे सेठ के द्वारा तुरंत बेघर करवाया जा रहा था, कहां पता चलते ही उस पर और उसके बच्चों पर प्यार बरसाना शुरू हो जाता है। कमाल का अभिनय दिखाया गया है एकांकी में सेठ का! यही अभिनय,यही मुखौटा लगाये रखने की आदत समाज के रसूखदार,दलक, दबंग लोगों की असलियत है।
कुल मिलाकर उदयशंकर भट्ट ने पर्दे के पीछे एकांकी के माध्यम से अनेक सामाजिक बुराइयों और धन पशुओं की जमाखोरी, टैक्स चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक कदाचार और नेता-अफसर -गुंडों के गठजोड़ को पूरी सच्चाई के साथ दिखाया है। वर्तमान समय में पूरी तरह स्वीकार्य मुखौटा संस्कृति पर भी एकांकीकार ने करारा व्यंग्य किया है।
© डॉ. संजू सदानीरा




