Assertive Communication क्या है? अपनी बात बिना डर और झिझक के कैसे रखें
कई बार ऐसा होता है कि हम किसी की बात से सहमत नहीं हों या उससे अलग राय रखते हों इसके बावजूद सामने वाले को बुरा न लग जाए इसलिए ख़ामोश रह गए। इसी तरह हम कुछ कहना चाहते हैं लेकिन बात मन में ही रख लेते हैं क्योंकि सामने वाला हमें ग़लत या स्वार्थी न समझ ले। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम विवाद की स्थिति से बचने के लिए अपनी बात नहीं कह पाते हैं और अपनी भावनाओं को दबा देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि बाहर से तो हम शांत दिखाई देते हैं लेकिन मन में भीतर ही भीतर नाराज़गी, दुख, गुस्सा और घुटन महसूस होती रहती है।
इसके विपरीत ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की बात की परवाह किए बिना सिर्फ़ अपनी ही इच्छा दूसरों पर थोपते रहें। दोनों ही परिस्थितियां कम्युनिकेशन के लिए बैरियर का काम करती हैं। हेल्दी कम्युनिकेशन का रास्ता इन दोनों के बीच से होकर गुज़रता है। न तो हर बात पर चुप रहना और अपनी भावनाओं को दबाना ठीक तरीका है न ही सिर्फ़ अपनी बातें थोपते रहना। मानसिक सेहत और हेल्दी रिलेशनशिप के लिए हेल्दी कम्युनिकेशन बेहद ज़रूरी है। यहीं पर Assertive Communication की भूमिका अहम हो जाती है।
क्या है Assertive Communication ?
Assertive Communication का मतलब है सामने वाले के विचारों और भावनाओं का सम्मान करते हुए अपनी भावनाओं, ज़रूरतों, विचारों और इच्छाओं को स्पष्ट और सम्मानजनक तरीके से व्यक्त करना। जैसे कि किसी भी मामले में दूसरे की राय से असहमत होने पर उसकी राय को महत्त्व देते हुए अपनी असहमति को व्यक्त करना। हालांकि यह सुनने में आसान लगता है लेकिन ज़्यादातर लोगों के लिए यह एक बड़ी चुनौती हो जाती है। ख़ासकर ऐसे मामलों में जब किसी ने एक लंबे समय तक पीपल प्लीजिंग की प्रैक्टिस की हो।
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Robert Alberti और Michael Emmons ने अपनी किताब Your Perfect Right में Assertive Communication के बारे में लिखा है “अपनी बात, भावनाओं और विश्वासों को सीधे, ईमानदारी से और उचित तरीके से व्यक्त करना, बिना दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन किए।” यानी यह एक ऐसा स्किल है जो बिना दूसरे के अधिकारों का उल्लंघन किए आपको अपनी भावनाओं, ज़रूरतों और विचारों को स्पष्ट और ईमानदार तरीके से व्यक्त करने में मदद करता है।
Passive, Aggressive, Passive-Aggressive और Assertive communication क्या हैं?
अलग-अलग व्यक्ति के कम्युनिकेशन का अलग-अलग स्टाइल होता है। यहां यह बात ध्यान में रखना भी ज़रूरी है कि एक ही व्यक्ति अलग-अलग समय या परिस्थिति में अलग कम्युनिकेशन स्टाइल को अपना सकता है। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व, विचार, ज़रूरतों, भावनाओं और लोगों के साथ उसके संबंधों पर निर्भर करता है। Psychology में कम्युनिकेशन करने के तरीकों के आधार पर इसे चार कैटेगरीज में बांटा गया है।
Passive Communication
इसमें व्यक्ति दूसरों की ज़रूरतों, भावनाओं और अधिकारों को प्राथमिकता देता है जबकि ख़ुद की ज़रूरतों और भावनाओं को पीछे छोड़ देता है। यानी दूसरों की नाराज़गी, विवाद और संघर्ष से बचने के लिए अपने विचार, भावनाएं, और बाउंड्रीज को स्पष्ट नहीं रखते। इनकी आवाज़ में दृढ़ता नहीं होती, आंखों का संपर्क कम होता है और आत्म विश्वास की कमी दिख सकती है। इसमें “जो आप कहें” या “कोई बात नहीं” जैसे वाक्यों का इस्तेमाल ज़्यादा होता है।
शुरुआत में तो इससे विवाद की स्थिति को टाला जाता है या फिर दूसरों को ख़ुश किया जा सकता है लेकिन लंबे समय में यह ख़ुद व्यक्ति के लिए नुकसानदेह साबित होता है। लंबे समय तक अपने विचारों और भावनाओं को दबाते रहने से यह low self esteem, low confidence और people pleasing जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है।
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Aggressive Communication
Aggressive Communication में व्यक्ति अपनी ज़रूरतों, इच्छाओं और भावनाओं को इतनी ज़्यादा अहमियत देता है कि दूसरे के विचारों और भावनाओं की बिल्कुल भी परवाह नहीं करता। एक तरीके से यह अपनी मर्ज़ी दूसरे पर थोपने जैसा है। इसमें दूसरों की आलोचना, धमकी, अपमान और गिल्ट ट्रिप जैसी चीजें आसानी से देखी जा सकती हैं। इसमें व्यक्ति की आवाज़ ज़रूरत से ज़्यादा तेज हो जाती है और तनाव वाले शारीरिक संकेत कॉमन हैं।
इस तरह के कम्युनिकेशन में व्यक्ति का मकसद दूसरे को कंट्रोल करना और जीतना होता है इसमें दूसरों की भावनाओं और ज़रूरतों की परवाह नहीं की जाती। शॉर्ट टर्म में तो इसे अपना काम बन जाता है ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं लेकिन लंबे समय तक Aggressive Communication होने से विद्रोह की गुंजाइश पैदा होती है। इससे रिश्तों पर बुरा असर पड़ता है साथ ही ख़ुद व्यक्ति में अकेलापन और गिल्ट भी आ सकता है।
Passive-Aggressive Communication
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है यह Passive और Aggressive दोनों कम्युनिकेशन का मिश्रण है। इसमें व्यक्ति ऊपर से देखने पर शांत दिखता है लेकिन उसके अंदर का आक्रोश और गुस्सा दूसरे माध्यमों से निकलता है। कभी-कभी यह व्यंग्य, साइलेंट ट्रीटमेंट या टालमटोल के रूप में देखा जा सकता है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सीधे संघर्ष या टकराव से बचते हैं इसलिए सामने “कोई बात नहीं” कहकर बाद में दूसरे तरीकों से अपनी नाराज़गी निकलते हैं।
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Passive-Aggressive Communication में व्यक्ति ख़ुद में भ्रम, अविश्वास और conflict पैदा होता है इससे वह ख़ुद भी फंसा हुआ महसूस करता है। यह भी एक अनहेल्दी कम्युनिकेशन स्टाइल माना जाता है क्योंकि इसमें समस्या हल नहीं होती बल्कि बढ़ती ही है।
Assertive Communication
Assertive Communication सबसे संतुलित और हेल्दी होता है। इसमें व्यक्ति अपनी ज़रूरतें, भावनाएं, और सीमाएं स्पष्ट, ईमानदार और सम्मानजनक तरीके से सामने रखता है। इसके साथ ही दूसरे के विचारों, भावनाओं और अधिकारों को भी ध्यान में रखता है। इसमें आवाज में दृढ़ता होती है लेकिन भाषा विनम्र होती है। व्यक्ति आत्मविश्वास से बोलता है लेकिन सामने वाले का सम्मान भी करता है।
इसमें आंखों का संपर्क और आत्मविश्वास अहम होता है। अपने विचारों, भावनाओं और सीमाओं का सम्मान करते हुए दूसरों का भी ध्यान रखा जाता है। इसमें विन-विन सिचुएशन लाने की कोशिश की जाती है। इससे सेल्फ एस्टीम बढ़ता है रिश्ते मजबूत होते हैं और यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा कम्युनिकेशन स्टाइल माना जाता है। इसे प्रेक्टिस करके सीखा जा सकता है।
क्यों ज़रूरी है Assertive Communication?
UNICEF (2022) के अनुसार, इंटरएक्टिव लर्निंग मेथड से छात्रों की भागीदारी में 35 फीसद तक की बढ़ोत्तरी देखी गई है। इसके साथ ही असर्टिव कम्युनिकेशन जैसे सोशल स्किल से conflict resolve करने की क्षमता में 28 फीसद तक बढ़ जाती है। इसी तरह MIT (2025) की एक रिसर्च में पाया गया कि debate training से assertiveness बढ़ने पर लीडरशिप में आगे बढ़ने की संभावना लगभग 12 फीसद तक बढ़ी हुई पाई गई।
इस तरह यह देखा जा सकता है कि assertiveness न सिर्फ़ व्यक्ति की ख़ुद की मानसिक सेहत और ख़ुशी के लिए ज़रूरी है बल्कि अच्छे रिश्तों के लिए भी एक अहम हिस्सा है। इसके साथ ही कॅरियर से जुड़े मामलों में जैसे कि टीम वर्क और लीडरशिप में भी यह काफ़ी असरदार पाया गया है। वर्कप्लेस पर भी है कॉन्फिडेंस बूस्ट करके बेहतर कम्युनिकेशन और को-ऑपरेशन को बढ़ाता है।
Assertive Communication को कैसे बढ़ाएं?
अब जब हम समझ चुके हैं कि Assertive Communication अच्छी मानसिक और शारीरिक सेहत, कॅरियर और रिश्तों के लिए कितना ज़रूरी है, सवाल यह है कि अपनी बात को बिना डर और हिचक के कैसे रखें जिससे अपनी बात भी रख सकें और सामने वाले को बुरा भी न लगे। इसके लिए कुछ रिसर्च पर आधारित तकनीक हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है…
1.“I” स्टेटमेंट्स का इस्तेमाल करना काफ़ी असरदार साबित होता है। सीधे सामने वाले को दोष देने की बजाय अपनी भावनाएं और ज़रूरतें स्पष्ट तरीके से सामने रखें।
2.Bower & Bower की DESC स्क्रिप्ट भी Assertive Communication का एक अच्छा तरीका है ।
Describe: स्थिति को स्पष्ट तथ्यों के साथ बताएं
Express: अपनी भावना व्यक्त करें।
Specify: स्पष्ट शब्दों में अपनी अपेक्षाएं बताएं
Consequences: सकारात्मक/नकारात्मक नतीजे बताएं।
इससे व्यक्ति में यह स्पष्ट होती है कि स्थिति क्या है? कैसा महसूस हो रहा है? क्या किया जाना चाहिए? उसके पूरा होने या न होने से किस तरह के नतीजे सामने आएंगे।
3.Broken Record तकनीक भी अपनी बात को दृढ़ता से रखने में मददगार साबित होती है। इसका मतलब है कि अपनी बात को स्पष्ट शब्दों में दृढ़ता के साथ कई बार दोहराएं। उदाहरण के लिए “मैं अभी यह काम नहीं ले सकती/सकता” यह बाउंड्री सेट करने में बहुत असरदार है।
4. शब्दों के साथ ही हाव-भाव और शारीरिक गतिविधियों की भी अहम भूमिका होती है। ये भी कम्युनिकेशन का सेकेंडरी सोर्स होते हैं। इसलिए आंखों में आंखें डालकर शांत लेकिन स्पष्ट आवाज में अपनी बात रखें। बिना डर और झिझक के फेशियल एक्सप्रेशन सामने वाले को यह मैसेज देते हैं कि अब बात को काटा नहीं जा सकता।
5. “ना” कहना सीखना भी बेहद ज़रूरी है। व्यक्ति की स्थिति को समझते हुए उसे बिना ख़ारिज किए विनम्रता से मना करना भी एक कला है। हर बार “ना” कहने के पीछे वजह देने की भी ज़रूरत नहीं होती है।
“ना” कहना सीखने के लिए यह लेख पढ़ें..
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6.Assertive Communication के लिए active listening और प्रेक्टिस करना ज़रूरी है। अपनी बात रखने के पहले दूसरों की पूरी बात ध्यान से सुनना होता है। प्रैक्टिस के लिए आईने के सामने रोल प्ले या फिर छोटे-छोटे डेली रूटीन से शुरुआत कर सकते हैं।
अपने परिवार, दोस्तों या क़रीबी लोगों के साथ इसकी प्रैक्टिस करना अपेक्षाकृत आसान होता है। मुश्किल परिस्थिति में पहले से ही प्रेक्टिस करना और इंपॉर्टेंट पॉइंट को लिख लेने से आसानी होती है। इसके साथ ही self-talk कभी इस्तेमाल करना चाहिए।
भारत जैसे देशों में जहां ख़ासतौर पर बड़ों की बात मानना सम्मान देने का एक तरीका समझा जाता है, वहां Assertive Communication काफ़ी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यहां यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि assertiveness का मतलब असभ्यता या अशिष्टता नहीं बल्कि सम्मान के साथ स्पष्टता है। Assertive Communication न सिर्फ़ मानसिक सेहत को सुधारता है बल्कि कॅरियर और अच्छे रिश्तों के लिए भी बेहद ज़रूरी होता है।
© प्रीति खरवार
FAQs:
1. Assertive Communication क्या है?
Assertive Communication अपनी भावनाओं, विचारों और ज़रूरतों को स्पष्ट और सम्मानजनक तरीके से व्यक्त करने का तरीका है।
2. Assertive Communication और Aggressive Communication में क्या अंतर है?
Assertive Communication में व्यक्ति अपनी बात का सम्मान करते हुए दूसरों की भावनाओं का भी ध्यान रखता है, जबकि Aggressive Communication में अपनी बात मनवाने के लिए दूसरों पर दबाव डाला जाता है।
3. Assertive Communication के क्या फ़ायदे हैं?
यह आत्मविश्वास बढ़ाने, स्वस्थ सीमाएँ तय करने, ग़लतफ़हमियाँ कम करने और रिश्तों में बेहतर कम्युनिकेशन बनाने में मदद करता है।
4. Assertive Communication कैसे सीखें?
अपनी भावनाओं और ज़रूरतों को स्पष्ट रूप से पहचानकर, शांत भाषा का इस्तेमाल करके और नियमित रूप से assertive responses का अभ्यास करके इसे सीखा जा सकता है।
5. Assertive Communication के उदाहरण क्या हैं?
“मैं आपकी बात समझती हूँ, लेकिन इस समय मैं यह काम नहीं कर पाऊँगी” जैसे स्पष्ट और सम्मानजनक जवाब Assertive Communication के उदाहरण हैं।
6. क्या Assertive होना rude होना है?
नहीं, Assertive होने का मतलब रूड या आक्रामक होना नहीं, बल्कि अपनी बात को स्पष्ट और सम्मानजनक तरीके से रखना है।
Source:
https://www.researchgate.net/publication/227367804_Assertive_Communication_Skills



