उल्लास कविता का भावार्थ

उल्लास कविता का भावार्थ अथवा मूल संवेदना

 

उल्लास कविता

शैशव के सुन्दर प्रभात का

मैंने नव विकास देखा।

यौवन की मादक लाली में

जीवन का हुलास देखा ।।

जग-झंझा-झकोर में

आशा-लतिका का विलास देखा।

आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का

क्रम-क्रम से प्रकाश देखा ।।

जीवन में न निराशा मुझको

कभी रुलाने को आयी ।

जग झूठा है यह विरक्ति भी

नहीं सिखाने को आयी ।।

अरिदल की पहिचान कराने

नहीं घृणा आने पायी।

नहीं अशान्ति हृदय तक अपनी

भीषणता लाने पायी।।

(सुभद्रा कुमारी चौहान)

उल्लास कविता का भावार्थ

उल्लास सुभद्रा कुमारी चौहान की आशावाद का संचार करने वाली एक लघु कविता है। इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने जीवन को पूरी गरिमा के साथ स्वीकार करने का संदेश दिया है।

कवयित्री के शब्दों में कहें तो इस जीवन में उन्हें बचपन के सुहाने प्रभात (सुबह) का नव विकास दिखाई देता है। तात्पर्य यह है कि सुबह सुहानी होती है। नया-नया दिन निकलता है। प्रकृति में सब कुछ स्निग्ध और शांत प्रतीत होता है। कवयित्री को भी जीवन ऐसा ही लगता है। इतना ही नहीं शैशव से आगे बढ़कर कवयित्री को जीवन यौवन की मधुर लालसाओं से भरे हर्ष की भी अनुभूति होती है।

ऐसा नहीं है कि कवयित्री के जीवन में कठिनाइयों तथा तूफानों का अभाव है लेकिन उनकी विशेषता यही है कि वह उन तूफानों में भी आगामी सृजन की आहट महसूस करती हैं। आकांक्षा, उत्साह और प्रेम उन्हें कदम-कदम पर प्रकाश के पथ की तरह दिखाई देता है। अर्थात बारिश, धूप, आंधी जैसे प्रकृति के आवश्यक अंग हैं, वैसे ही मुसीबत और झंझावातों में भी कवयित्री को अमिट खुशियों के आने की आस होती है। कवयित्री कहती हैं कि जीवन में कभी भी निराशा उनको रुलाने नहीं आई यानी कुछ भी हुआ तो उनकी सोच निराशा के समक्ष हथियार डालकर निष्प्रभ नहीं हुई। हमेशा चुनौतियों ने उन्हें नयी ऊर्जा प्रदान की।

शंकराचार्य के मायावाद और संसार के भ्रम होने की अवधारणा का भी कवयित्री खंडन करती हैं। उनके मन में इस प्रकार की विरक्ति कभी नहीं जगी कि यह संसार नश्वर है, भ्रम है। उनके हृदय में कभी दूसरों को अपना शत्रु समझने की घृणा नहीं जगी। न ही अशांति, बेचैनी ने उनके मन को बुरी तरह से मथ कर उन्हें निढ़ाल किया।

इस प्रकार सरल शब्दों में रचित यह कविता जीवन को देखने का एक सुंदर दृष्टिकोण देती है। प्रेम, स्नेह, सहानुभूति युक्त जीवन दर्शन से यह कविता भरी हुई है। सदा मुस्कुराने का हौसला रखने की प्रेरणा देते हुए कवयित्री इस कविता के माध्यम से चुनौतियों से न घबराने का संदेश भी देती हैं। बचपन और यौवन से जीवन की तुलना करते हुए उन्होंने जीवन के शांत, निर्मल और प्रणय से भरपूर होने की कामना की है।

प्रसाद गुण और पांचाली रीति से युक्त यह एक प्रेरणास्पद कविता है जो हर प्रकार से जीवन को जीने के योग्य, द्वेष से परे मानने की सलाह देती उल्लास कविता जीवन के विभिन्न चरणों में आशा, उत्साह और आनंद की अनुभूति को व्यक्त करती है।

 

© डॉ. संजू सदानीरा

 

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Dr. Sanju Sadaneera

डॉ. संजू सदानीरा प्रतिष्ठित मोहता पीजी कॉलेज में प्रोफेसर और हिंदी साहित्य विभाग की प्रमुख हैं। इन्हें अकादमिक क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का समर्पित कार्यानुभव है। हिन्दी, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान विषयों में परास्नातक डॉ. संजू सदानीरा ने हिंदी साहित्य में नेट, जेआरएफ सहित अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर शोध कार्य किया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के स्नातक के पाठ्यक्रम के लिए इनकी किताबें विशेष उपयोगी हैं। ये "Dr. Sanju Sadaneera" यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी शिक्षा के प्रसार एवं सकारात्मक सामाजिक बदलाव हेतु सक्रिय हैं।

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