किराए की कोख कहानी का सारांश/मूल संवेदना
किराए की कोख राजस्थानी साहित्यकार आलम शाह खान द्वारा रचित एक अत्यंत मार्मिक और सोचने को मजबूर करने वाली कहानी है। आलम शाह खान राजस्थान के महत्त्वपूर्ण साहित्यकार हैं। उन्होंने भारतीय समाज की ज़मीनी समस्याओं का अपनी कहानियों में विश्वसनीय तरीके से चित्रण किया है। आलम शाह खान का जन्म 31 मार्च 1936 ई में राजस्थान के उदयपुर शहर में हुआ था। 17 मई, 2003 को आलम शाह खान का इंतक़ाल हुआ और इस प्रकार से राजस्थान के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और भावुक कथाकार का सफ़र ख़त्म हुआ।
आलम शाह खान को राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा रांगेय राघव पुरस्कार और विशिष्ट साहित्यकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी विशेषता थी कि वह अपने आप को हमेशा एक साहित्यकार के रूप में पहचाना जाना पसंद करते थे जबकि वह मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी थे और डीन भी बने थे। उनके जीवन दर्शन की आज के समय बहुत ज़रूरत है। उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच और महिलाओं के लिए प्रगतिशील विचारधारा उनके साहित्य को पाठकों के बीच विशेष स्थान प्रदान करती है। परायी प्यास का सुख, किराये की कोख, एक और सीता, एक गधे की जन्मकुंडली, साँसों का रेवड़ इत्यादि उनके द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण कहानियां हैं।
किराए की कोख कहानी में लेखक ने कई समस्याओं को उजागर किया है। समाज में पुत्र-मोह और उसके परिणाम, स्त्रियों के साथ की जाने वाली ज़्यादतियां , परिवार में उनकी दोयम दर्ज़े की स्थिति और अंधविश्वास जैसी अनेक समस्याएं इस कहानी में उभर कर आई हैं। मुख्य रूप से इस कहानी में निम्न समस्याओं को चित्रित किया गया है-
1.पुत्र को तवज्जो देना
कहानी में बेटियों को न चाहने वाला आगेवान सिर्फ़ बेटों को ही तवज्जो देता है। वह सगुनवा की पत्नी को बेटे के लिए अदल- बदल करने को कहता है। वह नारी जीवन की गरिमा को महत्त्व नहीं देता है। अपनी एक पत्नी के रहते दूसरी वह सिर्फ बेटे की लालसा में लाता है और मां ने बन पाने के कारण उसे आसानी से सगुनवा को सौंप देता है। औरतों की इस बदहाली पर मनुष्यता शर्मसार हो जाए!
2. स्त्री जीवन की दयनीय स्थिति
कहानी में स्त्रियों का जीवन स्तर भी दयनीय दिखाया गया है, जो आज भी काल्पनिक नहीं है। कुई जैसी सुघड़ स्त्री भी अपने अधिकारों के बारे में कुछ नहीं जानती थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि उसका जीवन नरक बन गया। कोई भी मर्द हो, कुई को परेशान करे बिना नहीं जाता था। यह बहुत बड़ी विडम्बना की तरह दिखाया गया है।
3. नारी को कठपुतली समझना
शुरुआत से अंत तक कुई को सभी जन कठपुतली की तरह नचा रहे थे। एक से दूसरे के हाथ, दूसरे से तीसरे के हाथ सौंपते गए। कुई सिर्फ एक वस्तु बनकर रह गई थी। स्त्री की कोख ( प्रजनन की क्षमता) कैसे उसके जी का जंजाल बनती है, यह कहानी उसका जीता जागता उदाहरण है।
4. अंधविश्वास और स्त्री द्वेषी सोच
कहानी में अंधविश्वास भी उभर कर आया है। जब कुई आगेवान के यहां आई तो कुई जब गर्भवती थी तो आगेवान की पत्नी का मानना था कि वह उसकी बेटियों से दूर रहे, वरना उसकी छाया पड़ जाएगी,जो कि समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा देता है। ये न सिर्फ़ अंधविश्वास की बात है बल्कि लड़कियों के प्रति घृणा दर्शाने वाली सोच है।
5.दोस्त के वेश में छुपे दुश्मन
आगेवान जैसा भ्रष्टाचारी और मक्कार सगुनवा और कुई की मजबूरी को देखकर उनका फ़ायदा उठाता है। वह उनसे उनका रहने का स्थान छुड़वा देता है तथा सगुनवा से उसकी पत्नी की अदला बदली कर लेता है, जिससे कुई पर समस्याओं का पहाड़ टूट जाता है।
6. पितृसत्तात्मक समाज का असली चेहरा दिख जाना
कुई का पति सगुनवा कहानी के शुरु में यूं तो एक नेक इंसान के रूप में दिखाया गया है लेकिन कर्ज़ की मार से आख़िरकार टूट जाता है और बाद में मर्द होने की “तमाम ख़ासियत” से लैस दिखाया गया है। अपने बच्चों को छोड़ कर ‘दूसरी’ के साथ भाग जाता है। दूसरी आगेवान की दूसरी पत्नी है,जिसका आगेवान के निकट अब कोई मोल नहीं क्योंकि बेटा पैदा वह भी नहीं कर पाई थी।
सूद के बोझ से दबा दरबदर हुआ सगुनवा आख़िर अपने दोस्त आगेवान की मांग के सामने नियति को मान कर हार जाता है। उसके इस क़दम से अंत में यही लगता है कि जैसे औरतें कोई वस्तु हैं, जिन्हें कर्ज़ की मजबूरी में किसी और के सुपुर्द किया जा सकता है।
सगुनवा का आगेवान से ये कहना कि एक बार अपनी-अपनी पत्नी से पूछ लेना चाहिए, जहां उसकी सही सोच को दर्शाता है तो वहीं आगेवान का जवाब कि वह औरतों को कुछ पूछने के लायक नहीं समझता, उनको फैसला सुनाया जाता है- तो यहां पितृसत्तात्मक समाज का जैसे असली चेहरा दिख जाता है।
7.बेटी होने पर आगेवान की क्रूरता
जब कुई ने आगेवान के यहां बेटे के बजाय बेटी को जन्म दिया तब तो कुई पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। जो आगे वहां और उसकी पत्नी बेटे के लालच में कुई के आगे पीछे फिरते थे, वही लोग बेटी के जन्म के बाद उसे धक्के मार कर घर से निकालने में एक पल नहीं लगाया। उस नन्ही सी जान को लेकर वह कड़ाके की सर्दी में इधर-उधर भटकती रहती।
उसके बेटे सरजू व चंदू जो कुछ भी माँग कर लाते थे, उसी से उनका पेट भरता था। इधर सगुनवा पहले तो कुई के बगैर परेशान रहा, फिर किसी और औरत को लेकर वहां से चला गया। जिस समाज में दिन में भी औरत सुरक्षित नहीं, वहां रात के अंधेरे में वे और भी असुरक्षित महसूस करती हैं। कुई के साथ भी वैसा ही हुआ। लोग उसे भूखी नज़रों से घूरने लगे। वह नि:शक्त कहीं भी पड़ी रह कर सुरक्षित नहीं थी।
8.सरकारी विभागों की अस्त व्यस्त स्थिति
गांव में नसबंदी चल रही थी। लोग कंबल के चक्कर में नसबंदी कराने लग गए। डॉक्टरों ने जल्दबाजी कर दी जिससे कई लोगों को नुकसान हुआ। कुई को भी लोग जबरदस्ती पकड़ कर अंदर ले गए। बुरी हालत में कुई को कोई संभालने वाला भी नहीं था।अब वह अत्यंत कमज़ोर हो चुकी है। काम उससे होते नहीं।
उसका पति भी किसी और औरत के साथ चला ही गया है। हालत यह हो गई कि कुई को पागल समझ कर गांव के बच्चे उसे पत्थर मारने लगे थे।
9.कहानी का भयावह अंत
इस कहानी में जहां स्त्री जीवन को लेकर कई समस्याएं दिखाई गई हैं, वहीं मर्दों की वीभत्स असलियत को भी दिखाया गया है। औरत पागल हो, बीमार हो, अपाहिज हो- मर्दों के लिए वह मात्र शरीर- सुख का साधन होती है। कोई दो पैसे देकर, कोई धौंस दिखा कर तो कोई अपनी छत और घर का लालच दिखा कर एक निर्बल शरीर को निवाला बनाने की कोशिश करता है। यह असलियत सभ्य समाज पर एक तमाचे की तरह से कहानी में चित्रित की गई है।
कुई एक टूटे मकान में अपना ठिकाना बनाती है, राहगीर उसके पास सोते हैं,सुबह उठ कर निकल जाते हैं। एक दिन उसका बेटा उसे ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वहां तक आ जाता है और अपने आपको जवान मर्द की तरह बताता है तो बदहवासी में बीमार कुई उसके सामने अपनी साड़ी हटा देती है। कहानी की यह परिणति पाठकों को झकझोर कर रख देती है। इंसानियत को शर्मसार करने वाली इस समाज की यह तस्वीर इंसानियत पर भरोसा उठाने वाली है।
इस प्रकार किराये की कोख कहानी स्त्री को समाज में पुरुष के बराबर नहीं समझे जाने की ग़ैरबराबरी पर आधारित स्थिति को पूरी मार्मिकता के साथ दिखाती है। कहानी में स्त्री की हालत जिस तरह से दयनीय दिखाई गई है, वह कहीं से भी काल्पनिक नहीं है। बस सभ्य समाज में इस पर रेशमी पर्दे डाल कर छुपा दिए जाते हैं। आगेवान व सगुनवा जैसे लोग आज भी स्त्री जीवन की अस्मिता को नहीं समझते। वे घर की महिलाओं को मारते-पीटते हैं। घरेलू हिंसा में भारत के आंकड़े चिंताजनक हैं तो कन्या भ्रूण हत्या की डरावनी स्थिति से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
किराये की कोख कहानी परम्परा से अलग और साथ ही अपने लेखन के समय के हिसाब से एक नये विषय से सम्बन्धित है। हालांकि विषय कहानी के लिए नया हो सकता है लेकिन कहानी में व्याप्त पीड़ा बहुत पुरानी है। इस कहानी का वर्ण्य विषय जिस रूप में यहां प्रस्तुत किया गया है, वह आज की परिस्थितियों में देखा जा सकता है। पुत्र प्राप्ति के लिए शास्त्रों में नियोग तो आज कल सेरोगेसी जैसे विषय को भी कहानी छूती है। कहानीकार की ईमानदारी इस बात में है कि उसने किराए की कोख के प्रश्न को इस खूबी, संजीदगी और मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है कि पाठकों का मन दुख और अफ़सोस से द्रव हो जाता है।
© डॉ. संजू सदानीरा
यहां रोना मना है एकांकी के बारे में यहां पढ़ें..



