दुखिया के आंसू कविता का भावार्थ/ मूल संवेदना
दुखिया के आंसू कविता
बावले से घूमते जी में मिले।
आँख में बेचैन बनते ही रहें।
गिर कपोलों पर पड़े बेहाल से।
बात दुखिया आँसुओं की क्या कहें।1।
हैं व्यथाएँ सैकड़ों इन में भरी।
ये बड़े गम्भीर दुख में हैं सने।
पर इन्हें अवलोक करके दो बता।
हैं कलेजा थामते कितने जने।2।
बालकों के आँसुओं को देख कर।
है उमड़ आता पिता-उर प्रेम मय।
कौन सी इन आँसुओं में है कसर।
जग-जनक भी जो नहीं होता सदय।3।
चन्द-बदनी आँसुओं पर प्यार से।
हैं बहुत से लोग तन मन वारते।
एक ये हैं, लोग जिनके वास्ते।
हैं नहीं दो बूँद ऑंसू ढालते।4।
क्या न कर डाला खुला जादू किया।
आँख के आँसू कढ़े या जब बहे।
किन्तु ये ही कुछ हमें ऐसे मिले।
हाथ ही में विफलता के रहे।5।
पोंछ देने के लिए धीरे इन्हें।
है नहीं उठता दया-मय-कर कहीं।
इन बेचारों पर किसी हम-दर्द की।
प्यार-वाली आँख भी पड़ती नहीं।6।
क्यों उरों से ये दृगों में आ कढ़े।
था भला, जो नाश हो जाते वहीं।
जो किसी का भी इन्हें अवलोक कर।
मन न रोया जी पसीजा तक नहीं।7।
भाग फूटा बे बसी लिपटी रही
बहु दुखों से ही सदा नाता रहा।
फिर अजब क्या, इस अभागे जीव के।
आँसुओं का जो असर जाता रहा।8।
बह पड़ी जो धार दुखिया आँख से।
क्यों न पानी ही उसे कहते रहें।
है नहीं जिसने जगह जी में किया।
हम भला कैसे उसे आँसू कहें।9।
है कलेजे को घुला देता कोई।
मैल चितवन पर कोई लाता नहीं।
कौन दुखिया आँसुओं पर हो सदय।
पूछ ऐसों की नहीं होती कहीं।10।
दुखिया के आंसू कविता आधुनिक युग के महत्त्वपूर्ण साहित्यकार और खड़ी बोली के प्रमुख कवियों में से एक अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध द्वारा रचित है। इस कविता के माध्यम से कवि ने दुखी व्यक्ति के आंसुओं की उपेक्षा करने वाले निष्ठुर संसार को लक्ष्य किया है।
कवि असहाय और विपन्नन लोगों के आंसुओं की अविरल बहती धार से अत्यंत द्रवित हैं। उनको ऐसा प्रतीत होता है जैसे आंसू बावले अथवा दीवाने होकर बेचैनी से भटक कर आंखों से होते हुए गालों पर लुढ़क पड़ रहे हैं। दुखियारे लोगों के आंसू भी दुखियारे से ही हो रहे हैं। कदाचित कवि कहना चाहते हैं कि अमीरों के तो खुशी के आंसू भी आ सकते हैं लेकिन गरीबों को यह सुखद अनुभव कहां नसीब होता है!
गरीबों के आंसुओं में सैकड़ो व्यथाएं छुपी होती हैं। दुनिया की उपेक्षा से दुखी इन उपेक्षित लोगों के आंसू सने होते हैं। कवि सवाल करते हैं कि कोई सच-सच बताएं कि हाशिए पर रहने वाले इन लोगों की आंखों के आंसुओं को देखकर कितने लोग दुख से अपना कलेजा थाम लेते हैं? (अर्थात इनके आंसुओं से किसी को फ़र्क नहीं पड़ता)!
कवि अगली पंक्तियों में लिखते हैं कि अपनी संतान की आंखों में आंसू देख कर पिता का कलेजा प्रेम से भर जाता है, फिर परमपिता कहलाने वाला परमात्मा इन लोगों के आंसुओं से सदय क्यों नहीं होता?आखिर इनके आंसुओं में ऐसी कौन सी कसर रह जाती है?
आगे के पद्यांश में कवि लगभग कटाक्ष की मुद्रा में आ जाते हैं। सौंदर्य रस का पान करने वाले वे लोग जो चंद्रमुखी-सी दिखने वाली नायिकाओं के आंसुओं पर प्यार से तन-मन निछावर करने लगते हैं, “उन लोगों” को “इन लोगों” के आंसू दिखाई नहीं देते। एक तरफ सुदर्शन व्यक्तित्व वाले लोग हैं, जिनके लिए लोग क्या- कुछ नहीं उठा रखते और दूसरी तरफ यह वंचित समुदाय है, जिनके आंसुओं की तरफ संवेदना की एक बूंद कोई नहीं ढलकाता।
आमतौर पर आंखों से बहते अश्रु बहे या निकले,एक जादू का सा असर करते हैं। लोग बढ़ कर पूछते हैं, खुद को भी द्रवित पाते हैं, बस एक इन बेबसों के आंसु ही ऐसे हैं,जिनके हाथ विफलता लगती है (रोने पर कोई ध्यान नहीं देता)। इन बेबस, लाचार लोगों के आंसुओं को पोंछने के लिए कोई दयामय हाथ नहीं उठता। इन बेचारों पर किसी की प्रेम भरी दृष्टि नहीं पड़ती।
कवि को लगता है कि अच्छा होता अगर इनके अश्रु आंखों से न बहकर कलेजे में ही समाहित हो जाते, वहीं दुख उठ कर, वहीं समा जाते! अब तो ये बहते आंसू निराशा के शिकार हो रहे हैं कि इन्हें देख कर भी किसी का न मन रोया और न पसीजा। इन वंचित लोगों का भाग्य भी दुर्भाग्य बना रहा, बेबसी लिपटी रही और जैसे दुखों से ही सदा इनका नाता रहा। ऐसे में क्या आश्चर्य है कि इन अभागे प्राणियों के आंसू बेअसर रहे?
कवि आहत स्वर में कहते हैं कि दुखियारे लोगों की आंखों से बहते आंसुओं को पानी के समान ही मान लिया गया है। जिन आंसुओं को देख कर किसी का कलेजा न पिघले, वे लोगों के लिए आंसुओं के बजाय पानी ही बन चुके होते हैं।
एक तरफ तो तकलीफ़ से दुहरा होकर कोई अपने कलेजे को घुला देता है और दूसरी तरफ उन बहते आंसुओं से किसी के दिल पर शिकन तक नहीं आती! कवि इस निष्ठुर संसार की तरफ जैसे एक सवाल उछालते हैं कि कौन है जो इनके आंसुओं से प्रभावित हो, कहीं पूछ ही नहीं दिखाई देती है कमज़ोर के आंसुओं की तो!
इस प्रकार दुखिया के आंसू कविता समाज के दलित-दमित समुदाय के लोगों के रोने और उनके आंसुओं की बेखबरी पर ध्यान दिलाने वाली एक अभिधा प्रधान कविता है। यह कविता द्विवेदीयुगीन अन्य कविताओं की विशेषताओं से युक्त है। यह और इन जैसी सभी कविताओं में हिंदी के तत्कालीन प्रचलित शब्दों को लेकर किसी विषय पर वर्णन प्रधान रचना लिखी जाती थी। ऐसी कविताएं विषय तो अच्छा उठाती हैं लेकिन इनके प्रस्तुतीकरण में एक बोझिलता अनुभव की जा सकती हैं।
आंसू और दुखियारों जैसे शब्दों को उठाकर यह कविता मोटे तौर पर सामाजिक यथार्थ का चित्रण करती है। यह सच है कि गरीब, असहाय और कमजोर लोगों की परेशानियां अदृश्य दिखाई देती हैं, दूसरी तरफ दलक, शोषक, बाहुबली लोगों के दुख बहुत जल्दी दिखने लगते हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि दुखियारे के आंसुओं के कारणों की पड़ताल कवि ने नहीं की है, गोया आंसू प्राकृतिक रूप से आ रहे हैं, अगर कवि शोषण और ग़ैर बराबरी पर आधारित सामाजिक ढांचे को भी सवालों के दा दुखिया के आसूयरे में लेते तो कविता थोड़ी अधिक सार्थक बन पड़ती।
© डॉ. संजू सदानीरा
आधुनिक हिन्दी कविता के काल विभाजन के बारे में यहां पढ़ सकते हैं..



