जीवन फूल कविता का भावार्थ

जीवन फूल कविता का भावार्थ अथवा मूल संवेदना

 

जीवन फूल कविता

मेरे भोले मूर्ख हृदय ने

कभी न इस पर किया विचार।

विधि ने लिखी भाल पर मेरे

सुख की घड़ियाँ दो ही चार।।

छलती रही सदा ही

मृगतृष्णा सी आशा मतवाली ।

सदा लुभाया जीवन साकी ने

दिखला रीती प्याली ।।

मेरी कलित कामनाओं की

ललित लालसाओं की धूल ।

आँखों के आगे उड़-उड़ करती है

व्यथित हृदय में शूल ।।

उन चरणों की भक्ति-भावना

मेरे लिए हुई अपराध ।

कभी न पूरी हुई अभागे

जीवन की भोली सी साध ।।

मेरी एक-एक अभिलाषा

का कैसा झास हुआ।

मेरे प्रखर पवित्र प्रेम का

किस प्रकार उपहास हुआ ।।

मुझे न दुख है

जो कुछ होता हो उसको हो जाने दो।

निठुर निराशा के झोंकों को

मनमानी कर जाने दो।।

हे विधि इतनी दया दिखाना

मेरी इच्छा के अनुकूल ।

उनके ही चरणों पर

बिखरा देना मेरा जीवन-फूल ।।

सुभद्रा कुमारी चौहान

जीवन फूल कविता का भावार्थ

जीवन फूल कविता आधुनिक हिंदी साहित्य की महत्त्वपूर्ण साहित्यकार सुभद्रा कुमारी चौहान की लेखनी द्वारा रचित है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने कहानी भी उसी प्रवाह के साथ रची, जिस प्रवाह के साथ कविताएं। बाल साहित्य का भी उन्होंने प्रचुर संख्या में सृजन किया। झांसी की रानी उनकी बहुत लोकप्रिय कविता है, जो विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में लगाई जाती रही है। बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे सादे चित्र उनके कहानी संग्रह हैं। देश के प्रति, वीरों का कैसा होगा वसंत, जलियांवाला बाग, सभा का खेल और बोल उठी बिटिया मेरी उनकी अन्य चर्चित कविताएं हैं।

जीवन फूल कविता के माध्यम से कवयित्री ने स्त्री जीवन और आम इंसान की पीड़ा से त्रस्त जीवन का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री को पछतावा है कि उनके भोले हृदय ने कभी इस बात पर विचार ही नहीं किया कि विधाता ने उनके बाल (किस्मत) पर सुख की दो-चार घड़ियां मात्र ही लिखी हैं।

आशा की तुलना वे मतवाली मृगतृष्णा से करते हुए लिखती हैं कि उन्हें जीवन रूपी साकी ने दूर से प्याला (सुख) दिखा कर फुसलाया जबकि हक़ीक़त में प्याला खाली (निराशा/ दुख से भरा हुआ) था। कवयित्री के मन में जन्म लेने वाली कामनाओं की सरस लालसाओं की अधूरी स्थिति उनकी आंखों के आगे धूल बनकर उड़ती रहती है और उनके छलनी हृदय को शूल-सा बेधती रहती है।

प्रिय पात्र के चरणों के प्रति भक्ति उनके लिए अपराध सदृश हो गई है। उनके अभागे जीवन की निष्कलुष मनोकामना कभी पूरी न हो पाई। निस्वार्थ प्रेम कवयित्री के लिए अप्राप्य सुख हो चुका है। उनके शिशु सम पवित्र मन की एक निर्मल इच्छा कभी पूरी नहीं हो पाई।

निष्ठुर संसार में कैसे उनकी एक-एक अभिलाषा कुचली गई और उनके अमल प्रेम का कैसा मजाक बना-यह दुख कवयित्री को व्यथित करता है।

अब तनिक वीतरागता को धारण करते हुए कवयित्री कहती हैं कि उनको अब दुख नहीं है जो कुछ भी घटित होना है हो जाए। निराशा के निर्मम झोंके जो मनमानी उनकी खुशियों के साथ करना चाहते हैं कर लें। कवयित्री विधि (भाग्य) से इतनी विनती करती हैं कि वह कम से कम उनके जीवन पर इतनी दया तो अवश्य दिखा दे कि अंत में उनके जीवन रूपी फूल को उस अनन्य प्रियतम के चरणों पर बिखरा दे, निछावर कर दे।

इस प्रकार ग़ौर से देखने पर यह कविता कवि के अनन्य प्रेम (प्रिय पात्र) की जीवन में अनुपस्थिति युक्त उपस्थिति (न होकर भी होने का अहसास), सामाजिक प्रतिमानों के रूढ़िवादी ढांचे के कारण होने वाली उनके प्रेम की उपेक्षा और उपहास के साथ अंतिम इच्छा के रूप में अपने प्रियतम पर निछावर होने की दूरगामी अभिलाषा को शब्द दिए गए हैं। अभिधा प्रधान शैली में रचित यह एक प्रेम कविता है, जो भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति को दर्शाती है, जहां न उसकी उन्नति किसी के लिए प्रणम्य है, न उनकी व्यथा चिंतनीय है और प्रेम तो है ही निंदनीय। कुल मिलाकर जीवन फूल साधारण शब्दों में लिखी गई एक मार्मिक कविता है।

 

© डॉ. संजू सदानीरा

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Dr. Sanju Sadaneera

डॉ. संजू सदानीरा प्रतिष्ठित मोहता पीजी कॉलेज में प्रोफेसर और हिंदी साहित्य विभाग की प्रमुख हैं। इन्हें अकादमिक क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का समर्पित कार्यानुभव है। हिन्दी, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान विषयों में परास्नातक डॉ. संजू सदानीरा ने हिंदी साहित्य में नेट, जेआरएफ सहित अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर शोध कार्य किया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के स्नातक के पाठ्यक्रम के लिए इनकी किताबें विशेष उपयोगी हैं। ये "Dr. Sanju Sadaneera" यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी शिक्षा के प्रसार एवं सकारात्मक सामाजिक बदलाव हेतु सक्रिय हैं।

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